त्रिलोकतीर्थ शिलान्यास

त्रिलोकतीर्थ की स्थापना संत शिरोमणी आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज के पंचम पट्टाधीश एवं समाधि सम्राट पूज्य आचार्य श्री सुमति सागर जी महाराज के पट्ट शिष्य सिंह रथ प्रवर्तक राष्ट्र ॠषि स्याद्वाद केसरी परम पूज्य आचार्य श्री विद्याभूषण सन्मति सागर जी महाराज की प्रेरणा एवं शुभाशीर्वाद तथा मार्गदर्शन में भारत की राजधानी दिल्ली से 25 किलोमीटर दिल्ली-सहारनपुर हाइवे पर तहसील खेकड़ा जिला बागपत में रावण/बड़ागाँव में ऐतिहासिक तीर्थस्थली जो भगवान पार्श्वनाथ की समोशरण स्थली है और दशानन रावण ने यहाँ पर विद्या सिद्ध की, पाण्डवों ने लाक्षादि गृह से निकलकर आत्म रक्षा की, एवं लव-कुश का जन्म हुआ। इसी पुनीत स्थली पर भूगर्भ से प्राप्त अतिशय चमत्कारी तीर्थकर श्री पार्श्वनाथ भगवान की छत्रछाया में 317 फ़ुट उत्तुंग विश्व में पहली बार अनुपम कृति त्रिलोकतीर्थ धाम का निर्माण कार्य पूर्णता की ऊँचाइयों को छू रहा है। इस ऐतिहासिक कृति का शिलान्यास श्री दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र बड़ागांव जिला बागपत उत्तर प्रदेश में 10 नवम्बर 1998 को आचार्य श्री विद्याभूषण सन्मति सागर जी महाराज की स्वर्ण जयन्ती वर्ष के अवसर पर अखिल भारतीय स्याद्वाद जैन परिवार द्वारा प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल महोदय माननीय सूरजभान जी, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री शरद पवार, दिल्ली प्रदेश के मुख्य मन्त्री साहिब सिंह वर्मा आदि अनेकों गणमान्य राजनेता, समाज नेता एवं धर्म नेताओं के सांनिध्य में श्री गजराज जी गंगवाल, श्रीमान आर. के. जैन, श्री आर. पी. जैन, श्री एम. के. जैन, श्री जगदीश प्रसाद जी जैन आदि महानुभावों के कर कमलों से शरद पूर्णिमा की पुनीत बेला पर सम्पन्न हुआ। श्री के. सी. जैन, श्री विनय कुमार अशोक कुमार जी, श्री विनोद जी, श्री इन्द्रेश जी, श्री प्रवीन जी, श्री रमेश चन्द जी, श्री महेश चन्द जी, श्री प्रेम चन्द जी, श्री भोलानाथ कमल कुमार जी आदी महानुभावों का त्रिलोकतीर्थ विभागों के शिलान्यास मे सराहनीय सहयोग रहा है।

आगम के आइने में तीनलोक की रुपरेखा

स्याद्वाद रुप जैन सिद्धांत में तीन लोक की ऊँचाई 14 राजू, चौड़ाई प्रारंभ में 7 राजू, 7 राजू की ऊँचाई पर 1 राजू, 10 1/2 राजू की ऊँचाई पर 5 राजू एवं 14 राजू की ऊँचाई पर 1 राजू तथा गहराई सर्वत्र 7 राजू है। बीचों बीच 1 राजू लम्बी चौड़ी एवं कुछ कम 14 राजू ऊँची त्रसनाली है। त्रसनाली मध्यभाग के नीचे के भाग में भवनवासी व्यन्तर देव, 7 नरक एवं निगोद है। मध्य भाग में पृथ्वी लोक अर्थात् असंख्यात द्वीप-समुद्र मनुष्य, पशु पक्षी तथा सूर्य चांद तारे आदि सभी प्रकार के जीव जन्तु विचरण करते हैं। मध्यलोक के ढ़ाई द्वीप में विशेष रूप से मनुष्यो का निवास है। यहीं से त्याग तपस्या करके आत्मा को परमात्मा बनाया जाता है। उर्ध्वलोक में 16 स्वर्ग, 9 ग्रैवेयक, 9 अनुदिश तथा 5 अनुत्तर जिनमें सर्वार्थसिद्धि के उपर सिद्धशिला अवस्थित है, जहाँ पर कर्म मुक्त आत्मा शाश्वत आनन्द मे निमग्न रहते हैं।

तीनों लोकों में 7 करोड़ 56 लाख 98 हजार 481 शाश्वत जिन मन्दिर हैं। जिनमें विराजमान विशाल अरिहन्त सिद्धप्रभू की प्रतिमा जी के पूजन, भक्ति, अर्चना से देवगण अपने आपको कृतार्थ करते हैं। इसी दृश्य को बड़ागांव त्रिलोकतीर्थ धाम में मूर्तरुप दिया गया है, जिनके दर्शन पूजन से पाप प्रक्षालन के साथ मानव मात्र को जीने की कला के लिये नैतिकता के साथ प्रारम्भ से उच्चस्तरीय शिक्षा, स्वास्थ्य, जनसेवा के साथ योग, ध्यान द्वारा मनुष्य पर्याय को सार्थक करने का भी सौभाग्य प्राप्त होगा।

त्रिलोकतीर्थ का संक्षिप्त परिचय

आचार्य श्री विद्याभूषण सन्मति सागर जी महाराज के आशीर्वाद एवं प्रेरणा से विशाल भूभाग पर त्रिलोकतीर्थ की अनुपम रचना को मूर्तरुप दिया गया है। जिसके उपरिम भाग पर विश्व की प्रथम 31 फ़ुट ऊँची अष्टधातु से निर्मित भगवान आदिनाथ की विशाल पद्मासन प्रतिमा विराजमान की गयी है। त्रिलोकतीर्थ परिसर मे ध्यान केन्द्र, समवशरण, नन्द्वीश्वर द्वीप, त्रिकाल चौबीसी, सहस्त्रकूट चैत्यालय, विदेह तीर्थकर, मेरु मंदिर, कमल मंदिर, पार्श्वनाथ मंदिर, निर्वाण भूमी एवं तीस चौबीसी आदि कृतियों के साथ 184 फ़ुट उत्तुन्ग त्रसनाली की रचना में नरक स्वर्ग आदी के साक्षात् दृश्य दर्शनीय हैं।

प्रथम मंजिल

प्रथम मंजिल में 2 बड़े-बड़े हाल हैं। जिसमे एक ध्यान केन्द्र, प्रवचन भवन एवं चलचित्रों के माध्यम से स्याद्वाद परिवार, आचार्यश्री एवं त्रिलोकतीर्थ की झलकियाँ रहेंगी। द्वितीय हाल में पार्श्वनाथ मंदिर, सहस्त्रकूट चैत्यालय एवं भूगर्भ से प्राप्त अतिशय चमत्कारी प्रतिमा जी मंदिर होगा।

द्वितीय मंजिल

द्वितीय मंजिल में पंचमेरु, तेरह द्वीपों की रचना में विशेष रुप से नंदीश्वर द्वीप के 52 चैत्यालय, एवं मध्य लोक की रचना की गयी हैं।

तृतीय मंजिल

तृतीय मंजिल पर विदेह क्षेत्र के 160 चैत्यालय निर्मित हैं।

चतुर्थ मंजिल

चतुर्थ मंजिल पर विशाल समवशरण की रचना के साथ मे वर्तमान 24 तीर्थकरो के समवशरण निर्मित है।

पाँचवी मंजिल से सोलहवीं मंजिल तक अधोलोक, एवं उर्ध्वलोक, देव विमान, शाश्वत चैत्यालय एवं चैत्यवृक्ष, इन्द्रसभा आदि की रचना है।

त्रसनाली के नीचे के भाग में 7 नरकों के दु:ख पृथक-पृथक रुप में नक्काशी, रोबोट, एवं इलेक्ट्रानिक चलचित्रों के माध्यम से दिखाये जा रहे हैं कि जीव पाप कैसे करते हैं, बुढ़ापे मे क्या दशा होती है, नरक में उत्पन्न होते ही नारकी कैसा व्यवहार करते हैं, इन दुखों को दर्शाने का प्रयत्न किया गया है।

त्रसनाली के मध्य भाग में मध्यलोक के असंख्यात द्वीप समुद्रों की झांकी, पृथ्वी, सूर्य, चांद आदि ग्रह नक्षत्रों को दर्शाया गया है।

ऊर्ध्वभाग के 8 युगलों में 16 स्वर्गों के वैभव के साथ पुण्य एवं नियम व्रतों की महिमा, देवों की सुख सम्पदा, नक्काशी, चलचित्र एवं इलेक्ट्रोनिक पद्धति से दर्शाये जायेंगे।

अन्तिम मंजिल

अन्तिम मंजिल के उपरिम भाग में सिद्धशिला का दृश्य, सम्यक् दर्शन, सम्यग्ज्ञान एवं सम्यक् चारित्र के फ़लस्वरुप मोक्ष सुख की प्राप्ति के दर्शन परिलक्षित होंगे तथा बीचों-बीच त्रसनाली के ऊपर 31 फ़ुट ऊंची अष्टधातु से निर्मित प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ भगवान की प्रतिमा विराजमान होगी, जिसके दर्शन दिल्ली के लालकिले से किये जा सकेंगे।

मानस्तंभ

देव विमान, चैत्यवृक्षों के सन्मुख मानस्तंभों के प्रतीक त्रिलोकतीर्थ के चारों कोंनो पर 108 फ़ुट ऊँचे 4 मानस्तंभ निर्मित हैं। प्रत्येक मानस्तंभ में 28-28 चैत्यालय हैं। अन्दर के भाग में 24 जिनमंदिर हैं। प्रति मन्दिर में 3-3 वेदी हैं जिनमें त्रिकाल तीर्थंकरों की विशाल प्रतिमा जी विराजमान की जा रही हैं।

मेरु मन्दिर

त्रिलोकतीर्थ के परितः कैलाश पर्वत, सम्मेद शिखर, गिरनार, चम्पापुरी, पावापुरी आदी निर्वाण क्षेत्र एवं तीर्थक्षेत्रो की रचनाओं की योजना है। मेरु मन्दिर एवं विदेह बीस तीर्थंकर समवशरण तथा समुद्र रचना मूर्त रूप ले चुकी है।

सहस्त्रकूट

सहस्त्रकूट चैत्यालय मे 1008 रत्नो की प्रतिमा विराजमान की जा रही है। 1 प्रतिमा जी की न्योछावर राशी मात्र 51000, 25000 एवं 11000 रुपये है।

नोट

त्रिलोकतीर्थ एवं सहस्त्रकूट चैत्यालय मे एक प्रतिमा जी विराजमान करने का सौभाग्य अवश्य ही प्राप्त करे।
आज ही सम्पर्क कर अपना नाम लिखा दिजियें, क्योंकि प्रतिमा जी सीमित है।

विशेष

त्रिलोकतीर्थ के निर्माण मे सहभागी बनने का आप भी सौभाग्य प्राप्त कर सकते है। चैत्यालय, प्रतिमा जी, कमरो आदि का सहयोग देकर आप भी त्रिलोकतीर्थ के निर्माण मे सहभागी बनने का सौभाग्य प्राप्त कर सकते है। विशेष जानकारी हेतु सम्पर्क करें:
अशोक शास्त्री (+91 9319020157), त्रिलोक जैन (+91 9319274175), महेन्द्र जैन (+91 9810001005), पारस मणी जैन (+91 9999982442).

नोट

त्रिलोकतीर्थ एवं सहस्त्रकूट चैत्यालय मे एक प्रतिमा जी विराजमान करने का सौभाग्य अवश्य ही प्राप्त करे।
आज ही सम्पर्क कर अपना नाम लिखा दिजियें, क्योंकि प्रतिमा जी सीमित है।

त्रिलोकतीर्थ में 11 हजार या इससे अधिक राशि प्रदान करने वाले महानुभावों के नाम शिलापट्ट पर यथाक्रम अंकित रहेंगे और वह स्याद्वाद परिवार साधारण सभा के सदस्य भी रहेंगे।

कृप्या अ. भा. स्याद्वाद जैन (परिवार) सोसायटी सदस्य परिचायिका फ़ार्म अवश्य भरें।